Artificial Intelligence आगामी वर्षों में मानव और उसके अस्तित्व के लिए एक चुनौती बन जाएगा !

ये सच है कि बदलती और उन्नत होती तकनीक ने मनुष्य के जीवन को सुगम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है लेकिन इस बात को भी स्वीकार करने में कोई अचरज या हैरानी नहीं होनी चाहिए कि यदि इस तकनीक को और भी उन्नत कर दिया जाए जोकि मानव के बूते की बात है भी, तो वर्चस्व तो छोड़िए मानव अस्तित्व के लिए भी यह ख़तरनाक साबित हो सकता है, जिसका एक सीधा सा उदाहरण उद्योग घराने और निजी क्षेत्रों से कार्मिकों की छंटनी है।

बात अगर सिर्फ़ छंटनी तक ही सीमित हो तो भी विकल्प तलाशा जा सकता है लेकिन इसके द्वारा होने वाले दुरुपयोग की क्षतिपूर्ति करना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन भी है, अक्सर आपने लोगों को ज़िक्र करते या समाचार प्रसारण या प्रिंट मीडिया के माध्यम से सुना होगा deep fake वीडियो, जो और कुछ नहीं कृत्रिम मेधा का एक बेहद छोटा सा नमूना मात्र है।

आराम से लेकर घर के काम सभी चीज़ों को उपलब्ध करने और कराने में इसे महारथ हांसिल होगी, मानव में तो यहां तक कि इसे इस स्तर पर ले जाने की कुव्वत तक है कि एक समय के बाद यह मानव को ही नियंत्रित करने लग सकता है, ये तकनीक हमारी नहीं बल्कि हम ख़ुद इसके ग़ुलाम हो जाएंगे जो मानव की वासना रूपी भूख तक को शांत करने का आज दंभ भर रही है।

लेकिन अब ऐसे में सवाल ये है कि क्या अप्राकृतिक तरीके से और प्रकृति के विपरीत जाकर कृत्रिम मेधा को इस स्तर पर विकसित करना क्या मानव हित में होगा और क्या इसकी पहुंच आम लोगों तक होगी, प्रश्न हालांकि कठिन है लेकिन अंदाज़ा कुछ हद तक इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जिस तरह कंप्यूटर के आने के बाद घंटों का सवाल मिनटों में होना आसान हो गया जिससे कितने लोगों की नौकरियां भी गई।

उस समय कंप्यूटर अपवाद रूप से किसी किसी के पास होता था जिसकी देखरेख करना और खरीदना सभी के बूते की बात होना तो छोड़िए यह औद्योगिक स्तर पर ही मुश्किल से ही इस्तेमाल में लाया जाता था, लेकिन आज इसके इतर विपरितार्थक रूप से आज घर घर कंप्यूटर है बल्कि आज जिसके घर कंप्यूटर न हो उस स्थिति को अपवाद समझा जाता है और हालांकि यह स्थिति फ़िलहाल ज़्यादातर मेट्रो cities में बनी ही हुई है।

इसी तरह आज कृत्रिम मेधा नया और दुर्लभ है लेकिन आने वाले कुछ वर्षों में यह भी संभवतः सामान्य सा हो जाएगा, जो भविष्य की समाधान और चुनौती दोनों ही बनकर उभरेगा, यह कभी चुनौती होगा मानव रोज़गार लिए तो कभी चुनौती होगा आपसी संघर्ष के चलते मनुष्य अस्तित्व के लिए भी, तो इसके विपरीत यह कभी सुविधा और समाधान बनकर भी उभरेगा।

जिसका एक सटीक उदाहरण कुछ वर्ष पहले आई पिक्चर रोबोट है जो कभी सुविधा कभी समाधान तो कभी संघर्ष बनकर उभरा, आर्थिक तौर पर यदि उत्पादन बढ़ता है तो कई बार यह कंपनियों से कर्मियों की छंटनी का कारण भी बनता है, आज आर्थिक ही नहीं बल्कि सामरिक दृष्टि से भी कृत्रिम मेधा चुनौती बनकर उभरा है।

जिसका सीधा और स्पष्ट उदाहरण है रोबोटिक सेना, ड्रोन तकनीक और रोबोट डॉग्स आर्मी जिसके प्रतिविरोध में हमें भी इस क्षेत्र में महारथ हांसिल करना हमारी हमारी पसंद और उपलब्धि से कहीं अधिक हमारी अनिवार्यता होगी, चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी के साथ साथ आज हर भारतीय उनकी रणनीति से भी अवगत है जिसकी एक कड़ी सीधे तौर पर चीन की रोबोट आर्मी को टक्कर देना भारत की मजबूरी है ख़ासकर के ऐसे में जब इस तरह के प्रपंची देश हमपर शीत युद्ध या युद्ध थोपने की कोशिश करें।

लगभग 140 करोड़ की जनसंख्या वाला देश जहां बेरोज़गारी होना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा, पहले से ही कुछ क्षेत्रों में बेरोज़गारी की मार झेल रहे देश में अगर कृत्रिम मेधा व्यापक स्तर पर अपनी जगह लेता है तो वाकई यह स्थिति चिंताजनक हो सकती है रोज़गार ही नहीं बल्कि कई लिहाज़ से यह स्थिति गंभीर रूप से समीक्षात्मक होनी चाहिए।

इस स्थिति से उभरने का एक समाधान कृत्रिम मेधा में ही कैरियर बनाने का हो सकता है जो उसके ही परिचालन द्वारा किया जा सकता है तो दूसरा इस तकनीक और इससे संबंधित अधीनस्थ तकनीक का दूसरे देशों में निर्यात, स्थिति चाहे आर्थिक हो या निजी या सामरिक, घरेलू हो या अंतरराष्ट्रीय सभी स्तर और पहलुओं पर इसने अभी से विकल्प तलाशने को मजबूर कर दिया है कि भविष्य या सीधा कहें तो निकट भविष्य की राह कितनी मुश्किल हो सकती है।

क्योंकि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं कई बार किसी चीज़ के लाभ से अधिक हानि और सकारात्मक से ज़्यादा नकारात्मक इस्तेमाल भी हो जाते हैं और कृत्रिम मेधा के साथ सबसे बड़ा खतरा और संकट इसी बात का है।

ख़ैर स्थिति या परिस्थिति चाहे जो भी हो, परिणाम चाहे जो भी हो, लेकिन समय और वैश्विक परिदृश्यों को देखते हुए, और यदि विकसित देशों से कदम से क़दम मिलाकर चलना है साथ शत्रु राष्ट्रों से पार पाना है तो कृत्रिम मेधा को और विकसित करना और इसी क्रम में आगे बढ़ना आज समय की मांग है जो बदलते परिवेश में आवश्यकता ही नहीं बल्कि अनिवार्यता भी है।

रिपोर्ट :- सुदेश कुमार, नई दिल्ली