अयोध्या/उत्तर प्रदेश : आचार्य सत्येंद्र दास: रामलला के अटूट भक्त और संघर्षशील पुजारी

आचार्य सत्येंद्र दास ने अपने जीवन के 34 वर्षों तक रामलला की सेवा की, जिसमें उनका एक लंबा संघर्ष और भक्ति का अद्भुत उदाहरण देखने को मिलता है। वे राम मंदिर के मुख्य पुजारी के रूप में कार्यरत रहे और राम जन्मभूमि आंदोलन से लेकर भव्य मंदिर में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा तक के साक्षी रहे।

बाबरी विध्वंस के समय रामलला की रक्षा

6 दिसंबर 1992 को बाबरी विध्वंस के दौरान जब विवादित ढांचे को गिराया जा रहा था, तब सत्येंद्र दास गर्भगृह में रामलला की मूर्तियों की रक्षा कर रहे थे। जब गुंबद टूटने लगा और मलबा गिरने लगा, तब उन्होंने शीघ्र निर्णय लिया और रामलला, भरत व शत्रुघ्न की मूर्तियों को गोद में उठाकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। इसके बाद रामलला को एक टेंट में स्थापित किया गया, जहां 28 वर्षों तक पूजा-अर्चना होती रही।

28 वर्षों तक टेंट में सेवा, नाममात्र वेतन

आचार्य सत्येंद्र दास ने 28 साल तक टेंट में रहते हुए रामलला की पूजा-अर्चना की। इस दौरान उन्हें मात्र 100 रुपये मासिक वेतन मिलता था, लेकिन उन्होंने अपनी सेवा में कभी कोई कमी नहीं आने दी। इसके बाद करीब चार वर्षों तक अस्थायी मंदिर में पूजा जारी रही, जब तक कि भव्य राम मंदिर का निर्माण पूरा नहीं हो गया।

राम मंदिर में प्रमुख भूमिका

राम मंदिर ट्रस्ट के प्रमुख सदस्य रहे सत्येंद्र दास न केवल पूजा-अर्चना में समर्पित थे, बल्कि उन्होंने मंदिर निर्माण से जुड़े हर महत्वपूर्ण क्षण में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। जब 22 जनवरी 2024 को राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई, तब भी वे मुख्य पुजारी के रूप में रामलला की सेवा में समर्पित थे।

आचार्य सत्येंद्र दास का जीवन त्याग, भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। उनकी जीवन यात्रा न केवल राम जन्मभूमि आंदोलन का हिस्सा रही, बल्कि उन्होंने अयोध्या में रामलला की अनवरत सेवा का मिसाल भी कायम किया।

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