सारी रात देखते रील रहते हैं। इससे एंजाइटी फील होती है। युवा इंटरनेट सिंड्रोम के शिकंजे में फंसते जा रहे। चिंतित माता-पिता बच्चों को लेकर अस्पताल भाग रहे हैं। बच्चे अनिद्रा का शिकार हो रहे हैं। मस्तिष्क में उथल-पुथल रहती है। मन में अजीब किस्म के भ्रम पनपते हैं।
मंगलवार दोपहर 12 बजे कानपुर के हैलट के मनोरोग विभाग की ओपीडी में विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. धनंजय चौधरी और दूसरे सहयोगी डॉक्टरों के चेहरों पर तनाव की लकीरें खिंच गईं। डॉक्टर बनने के लिए काकादेव से नीट की कोचिंग कर रही छात्रा फफक कर कहती रही कि ब्रेकअप हो गया।
रात भर रील देखते रहते हैं, एंजाइटी फील होती है। पैनिक अटैक पड़ने लगते हैं तो फिर रील देखने लगते हैं। गंदी रील सबसे अधिक देखते हैं। मंगलवार की ही ओपीडी में एक दूसरा केस नौबस्ता में रहने वाले 21 साल के युवक का आया।
वह रो-रोकर कहता रहा कि मुझे डर लगता है। डॉ. चौधरी ने पूछा कि किससे डर लगता है तो उसने आंखें नीचे झुका लीं, फिर कुछ नहीं बोला। तब उसके पिता कहने लगे कि पता नहीं मोबाइल फोन पर क्या देखता रहा। एक दिन डर गया था, तब से सो नहीं रहा।
खाना भी नहीं खाता है। पूरा घर परेशान है। स्क्रीन की लत के कारण युवाओं में इंटरनेट सिंड्रोम के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। विभागाध्यक्ष डॉ. चौधरी का कहना है कि रोगी अब गंभीर लक्षण लेकर आने लगे हैं। छात्र-छात्राओं की पढ़ाई चौपट हो जा रही है और कॅरिअर दांव पर लगने लगे हैं।
ये रोगी सोते नहीं हैं, मस्तिष्क में उथल-पुथल रहती है। अजीब किस्म के भ्रम जेहन में पनपते हैं। विभाग में आने वाले इस तरह के जटिल 24 मामलों की हिस्ट्री का अध्ययन किया जा रहा है।
बाल मनोचिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. कृतिका चावला ने बताया कि एक 20 साल का युवक लगातार थूकता रहता है। वह कहता है कि अगर उसने थूकना बंद किया तो माता-पिता मर जाएंगे। जितना वह थूकेगा, उतने वे सुरक्षित रहेंगे। इसके अलावा कुछ रोगियों ने दावा किया कि उन्हें ग्रीक देवी-देवता नजर आते हैं जो उनसे बात करते हैं। एक रोगी लगातार अपने मन में नंबर डायल करता है। उसका कहना है कि उसकी तरह का एक व्यक्ति और है जिसका नंबर मिला रहा है।
स्क्रीन से बिगड़ता न्यूरो केमिकल का सांमजस्य
स्क्रीन लगातार देखने का दुष्प्रभाव मस्तिष्क पर आता है। इससे न्यूरो केमिकल का सामंजस्य बिगड़ता है। इसके साथ ही ऑब्सेशन हो जाता है। इसकी वजह से दिक्कत आती है। इसके साथ ही नींद न लेने का दुष्प्रभाव रहता है। -डॉ. धनंजय चौधरी, विभागाध्यक्ष, मनोरोग
ऐसे पहचानें बच्चों की दिक्कत
- घर वालों से बात करना बंद कर दे
- निगाह मिलाकर बात न करे और चिड़चिड़ाए
- खाना ढंग से न खाएं, छोटी बात पर अधिक गुस्सा करे
- घर में अकेला बैठा रहे, मुस्कराए और भौंहें चढ़ाए
- आंखें चढ़ी-चढ़ी रहें जैसे नशे में हों
इन बातों का रखें ध्यान
- बच्चे से प्यार से बातें करें खासकर जो उसे पसंद हों
- उसके मोबाइल देखने की अवधि सीमित कर दें
- उसे बाहर घुमाने के लिए ले जाएं
- साइकोलॉजिस्ट से उसकी काउंसलिंग कराएं
- घर का माहौल खुशनुमा रखें
