मनुष्य ईश्वर द्वारा सृजित प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना है जिस प्रकार प्रत्येक शब्द का एक जोड़ा है ठीक उसी प्रकार मनुष्यों में पुरुषों” का जोड़ा स्त्री है। हम जिस समाज मे रहते हैं। वहाँ प्राय पितृसत्तात्मकता देखने को मिलती है तथा इस प्रकार की कुरीति आदिकाल से चली आ रही है जहां पुरुषों को प्रधान मानने की मानसिकता चली आ रही है। जिसके कारण महिलाओं को समाज में वह स्थान प्राप्त नहीं हो पाया, जिसके हकदार वे कल भी थे और आज भी हैं। नारी को सदा से ही दासी, भोगया एवं प्रजन्नी समझा जाता रहा है।
शारीरिक बनावट के आधार पर उनका मानसिक शारीरिक तथा शैक्षणिक दमन किया जाता है। बात सिर्फ पिछड़े अथवा विकासशील राष्ट्रों की ही करें तो यह तर्कसंगत नहीं होगा विकसित देश भी स्वयं को इस कुरीति से अछूता नहीं रख सके हैं। बात यदि विकसित देशों की, की जाए तो सन् 1918 में इंग्लैंड में महिलाओं को मताधिकार का दर्जा मिला था तथा अमेरिका में सन् 1920 में उन्हें यह दर्जा हासिल हुआ। सवाल यह है कि जिस देश में महिला को व्यक्ति का दर्जा इतने समय तक न मिला हो वहाँ समान नागरिक संहिता या प्रत्येक व्यक्ति को समान रूप से न्याय मिल पा रहा है, कहना कहाँ तक न्यायसंगत होगा ?
आदिकाल से ही चली आ रही भ्रामक धारणाएं हैं जो महिलाओं के सशक्तिकरण को समय समय पर चुनौती देती रही है। इसमें प्रसिद्ध किताबों में भी इस -प्रकार का ध्रुवीकरण स्पष्ट रूप से दृष्टव्य है। सदियों से दमनकारी नीतियों एवं कुंठित मानसिकता से प्रभावित रही नारी आज सिर्फ घरेलू कामकाज तक ही सीमित नहीं है, उसमें आज छटपटाहट है खुद को साबित करने की और यह सब देख कर पुरुषों में व्याकुलता है जिसे पुरुष समाज पचा नहीं पा रहा है फलस्वरूप समय-समय पर उनके पैरों में बेड़ियों को मज़बूती देने के लिए उनके समक्ष कुतर्क प्रस्तुत किए जाते हैं।
हमें यह स्मृत अवश्य होना चाहिए कि नारी भी प्रकृति की तरह ही सृजनात्मक है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार प्रकृति का कार्य है सृजनात्मकता उसी प्रकार नारी भी सभ्यता एवं संस्कृति को संजो कर रखने वाली एक शक्ति है, वैसे तो स्त्री को भारत में सदा-सर्वदा देवी या शक्ति के रूप में पूजा जाता रहा है किंतु एक तरफ स्तुति तो दूसरी तरफ उसका दमन अपने आप में एक विरोधाभास है। जो महिलाओं के प्रति हमारे समाज में व्याप्त धारणा के प्रति संशय का भाव उत्पन्न करता है।
इतिहास समाज का एक ऐसा दर्पण होता है जहाँ व्यक्ति अपनी छवि देख अपनी स्थिति का अनुमान लगा सकता है। महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए आधुनिक भारत में भी ऐसे महापुरुष हुए जिन्होंने उनकी स्थिति को सम्मानजनक दशा और दिशा देने का प्रयास किया। इनमें प्रमुख रूप से स्वामी दयानंद सरस्वती, राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर सरीखे महानुभूति शामिल हैं जिन्होंने महिलाओं के प्रति हो रहे अत्याचारों एवं मानसिकताओं में परिवर्तन का कार्य किया।
जिनमें प्रमुख हैं विधवा पुनर्विवाह, सतीप्रथा का अंत,बाल विवाह का विरोध आदि। जिन्होंने उनकी स्थिति में निस्संदेह सुधार कर महिलाओं के सुनहरे भविष्य का मार्ग प्रशस्त किया जिसने महिलाओं से हो रहे भेदभाव पर आंशिक रूप से विराम लगाकर विधि एवं शासन को उनके उत्थान हेतु सोचने पर मजबूर किया जिसके फलस्वरूप मे कानून में संशोधन किए गए जैसे संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण, लिग आधारित भेदभाव पर अस्तित्व में आया कानून अनुच्छेद15(1),15(2), पीपीएनडीटी कानून 108 वां संविधान संशोधन इत्यादि।
वर्तमान में नारी की दशा में पूर्व की अपेक्षाकृत काफी सुधार हुआ है यह साफ तौर पर देखा जा सकता है कि नारी सिर्फ छोटे ही नहीं बल्कि आज के समय में नारी बड़े पदों पर भी आसीन है जिनके कुछ प्रत्यक्ष उदाहरण है जो स्पष्ट रूप दृष्टव्य हैं फिर चाहे वह भारत की प्रथम महिला आईएएस रही अन्ना जॉर्ज हो या डॉक्टर किरण बेदी, महिला फाइटर पायलट अवनी चतुर्वेदी, चाहे विश्व खेलों में अपना परचम लहरा चुकी बबीता फोगाट, तेज महिला धावक हिमा दास तथा ना जाने कितने ऐसे नाम हैं जिन्होंने समय समय पर अपना लोहा मनवा कर साबित कर दिया है कि नारी सिर्फ घरेलू कामकाज या पुरुषों की क्षुधा को शांत करने वाली कोई वस्तु मात्र नहीं है गौरतलब है कि शिक्षा के क्षेत्र में 70 से 75% तथा मेडिकल क्षेत्र में 60% महिलाएं चिकित्सक पहले ही कार्यरत है जो इन क्षेत्रों में अपनी सेवा दे रहे हैं जो कम से कम आज के समय में यह धारणा का आधार तो कतई नहीं बन सकता कि किसी भी रूप में आज की नारी पुरुषों के मुकाबले कमजोर है।
आज का समय है नारी शक्ति को वह दर्जा देने का जिसके वे वास्तव में हकदार हैं नैतिकता के आधार पर उन्हें प्रोत्साहित करने का तथा उनको भी प्रत्येक वह हक देने का जो एक पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों के पास एकाधिकार के रूप में उन्हीं में निहित है, विधि द्वारा समाज में समय-समय पर उनकी स्थिति की समीक्षा का प्रावधान हो एवं आवश्यकता पड़ने पर संविधान में भी संशोधन हो तथा उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में समान अवसर भी मिले “क्योंकि एक नारी शिक्षा से पूरा समाज शिक्षित होता है, जो नारी नारायणी शब्द की सार्थकता को सिद्ध करता है”



